निलु फुले जी की जीवनावली – Biography of Nilu Phule ji

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नमस्कार दोस्तों, apnasandesh.com में आपका स्वागत है। आज के आर्टिकल में हम पढ़ेंगे की निलु फुले जी की जीवनावली – Biography of Nilu Phule ji, और उनके महत्वपूर्ण कार्यो के बारे में हम जानकारी प्राप्त करेंगे उम्मीद है की यह लेख आपको पसंद आए।

निलु फुले जी की जीवनावली - Biography of Nilu Phule ji

निलु फुले जी की जीवनावली – Biography of Nilu Phule ji (1930 – 2009)

नीलकंठ कृष्णा जी उर्फ़ निलुभाऊ फुले सुरुवात में वे अल्पकाल के संघ शाखा के साथी थे। उसमे मुस्लिम, ईसाई, धार्मिक मित्रों का इसमें स्वागत नहीं किया जाता है। जैसे ही ऐसा हुआ, संघ छोड़कर, वह राष्ट्र सेवा दल में शामिल हो गए। वह समय स्वतन्त्रता आन्दोलन का था। भारत को आजादी मिलते ही भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक संघटनों ने धर्म, जात, वर्गविर्हित, समाज निर्माण का काम की सुरुवात अपने कन्दो पर ली। निलुभाऊ ने नाट्य, चित्रपट क्षेत्र में अपने सयंत अभिनव से अपने स्वतंत्र पहचान को बनाया। और साथ –साथ अपने आन्दोलन का दामन भी छोड़ा नहीं।

निलुभाऊ के अभिनय करने का उद्देश्य समाज सुधारणा और प्रगतिशील सोच को निर्माण करना था। पदानुक्रम, लड़ना, झगड़ना,उत्पीडन और संघ के शक्ति का दुरूपयोग करनेवाले हुकूमत का मूलतः विरोध किया।

 

निलु फुले जी का जन्म – Born of Nilu Phule ji :

नीलू फुले इनका जन्म 1930 में पुणे खडककम क्षेत्र के बोरात वार्ड में हुआ। जैसे तैसे 9 वी तक शिक्षा ली और राष्ट्र सेवा दल में शामिल हो गए। स्वतंत्रता के आन्दोलन में उनका सक्रिय सहभाग रहा। जब महात्मा गांधी को 1945 में आगाखान पैलेस से मुक्त कर उनका प्रकृति उपचार के लिए आश्रम में लाये थे तब सेवा दल के सैनिक के रूप में काम किये। 1957 में संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन शुरू किया गया उस आन्दोलन में भी सक्रीय कार्यकर्ता के रूप में भाग लिया था। पुणे के कानूनी विभाग में मेडिकल कृति के रूप में नौकरी भी कि।

राष्ट्र सेवा दल के कल्पकट को उनके जीवन में एक नया मोड़ मिला। इस टीम के माध्यम से विभिन्न नाटक अस्तित्व में आए। नीलू फुले ने बड़े ही उत्साह के साथ इसमें सहभाग लिया था। इस मराठी कलापथक में “पुढारी पाहिजे” (ले. पु. देशपांडे),” कुणाचा कुणाला मेंळ नाही”, “बिन बियांचे झाड़ ” (ले. व्यंकटेश माडगूळकर ), लाल चीनच्या आक्रमणाचा फार्स ( ले. दादा कोंडके ) इस प्रकार के लोकनाट्य में मनपूर्वक काम किया। इस कलापथक में राम नगरकर व दादा कोंडके ने भरपूर सहयोग किया।

 

निलु फुले जी की फिल्म जगत में सुरुवात – Nilu Phule ji starts in film industry :

नीलू फुले नाटको में काम करते करते 1968 में फिल्म जगत में भी अपने अभिनय की सुरुवात की। उनका पहला मराठी फिल्म “एक गाव बारा भानगडी” यह था। “सामना”, “सिंहासन”, “पिंजरा”, “सोंगाड्या”, “थापाड्या”, “चोरीचा मामला”, “लक्षमी पुढचे पाउल”, ‘’ जैत रे जैत”, “सेनानी साने गुरूजी” ऐसे मराठी फिल्म जगत में अपने दर्जेदार अभिनय से फिल्म जगत को समृद्ध किया। नीलू फुले मराठी फिल्मो में ही नहीं बल्कि हिंदी फिल्मो में भी अभिनय किया। कलाकार दिलीपकुमार के साथ “मशाल”, अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ “कूली”, में अनुपम खेर के साथ “सारांश”, आदि फिल्मो में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

“ सखाराम बाईनडर”, “सूर्यास्त”, “जंगली कबूतर”, “बेबी”, “राजकारण गेल चुलीत”, “लवंगी मिर्ची कोल्हापुरची”, “मी लाडकी मैना तुमची”, आदि नाटको में नीलू फुले जी की अविस्मर्णीय भूमिका की थी।

मराठी फिल्मो के खलनायक, तालेवार पुढारी, साखरसम्राट, जैसे फिल्मो में ऐसी भूमिका निभाई है। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें वास्तविक जीवन में खलनायक होना चाहिए। परन्तु उनके निजी जीवन में इसके विपरीत ही भूमिका थी। सामाजिक विषमता से दुःख महसूस करते थे, जैसे में गए वैसे बन जाते थे। मेहनती, पारिश्रमिक लोगो के घर अक्सर जाते व बाते करते थे।

उन्हें सत्ता, पैसा व प्रसिद्धी जैसे चीजो का कोई मोह नहीं था। सरकारी पुरस्कारों को उन्होंने हमेशा नकारा था। फिल्म जगत में बड़े कलाकारों को बड़ी रक्कम मिलती थी व वह के फिल्मो में कामगार लोगो को काफी न्यूनतम मजूरी मिलती थी। इस बात को समझ आने पर उन्होंने एक संघटना बनाई। दुसरो के हक्को के संघर्ष के लिए कभी भी हिचकिचाए नहीं, समाज हित ही उनके जीवन का समाधानी आधार था।

 

निलु फुले जी का सामाजिक कार्य – Social work of Nilu Phule ji :

समाजवादी पार्टी में सक्रीय थे, 1975 ते 1977 आपातकालीन समय में गुप्त प्रचारपत्र के वितरण में उनका सहभाग था। 1977 में जनता दल व 1989 के चुनाव में जनता दल, व बहुजन महासंघ के प्रचार में अग्रभागी थे। इस प्रकार गोवा मुक्ति संग्राम, संयुक्त महाराष्ट्र आन्दोलन, आपातकालीन विरुद्ध आन्दोलन, महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति, ऐसे सभी जन आन्दोलन में उनका सक्रीय सहभाग था। वह सामाजिक कार्यो के लिए व सेवाभावी संस्थानों को अपने कमाई का कुछ हिस्सा दान करते थे।

आदिवासी सामूहिक नृत्य, धनगर के शुभकामनाये, कोळी के नृत्य इत्यादि लोककला को ही नहीं बल्कि उन कलाकारियो को रंगमंच में लाने का कार्य किया। उनके लिए रंगमंच बनाया। फुले-शाहू –आंबेडकर विचारधाराओं को सांस्कृतिक कार्यकर्मो के माध्यम से लोकजीवन में लाने का प्रयास किया।

उनके जीवन पर डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर, महात्मा फुले, महात्मा गांधी, डॉ. राममनोहर लोहिया, इनके विचारो का काफी प्रभाव पढ़ा। डॉ राममनोहर लोहिया जन्म शताब्दी समिति के अध्यक्ष के रूप में अंत समय तक कार्यरत थे।

 

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धन्यवाद।

Author By : सविता …

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