Hard working capital – मेहनत (Real earnings of hard work) की पूंजी

मेहनत की पूंजी – Hard working capital, परिश्रम की सच्ची कमाई – Real earnings of hard work, मेहनत की असली कमाई – Real earnings of hard work

नमस्कार दोस्तों, apnasandesh.com में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों आप जानते ही परिश्रम की कमाई कभी व्यर्थ  नहीं जाती। इसीलिए दोस्तों आज के इस लेख में परिश्रम की कमाई के बारे में जानने वाले है।

Hard working capital - मेहनत (Real earnings of hard work) की पूंजी

चाहे कितने भी मुश्किल से भी मुश्किल वक्त क्यों न आए,

ऐ मंझिल मै कभी भी सच का साथ नहीं छोडूंगा,

और परिश्रम करके खरा सोना हासिल करूँगा।

जी आप जो करने की सोचेंगे वह आप का परमेश्वर है। परिश्रम की परिभाषा भी कुछ इस तरह ही है, आपके परिश्रम और जी तोड़ मेहनत का एक हिस्सा ही होता है। यदि आप खुद के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, तो यह स्वचालित रूप से बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकता है। मनुष्य के जीवन में स्वार्थ उसके मेहनत से आगे नहीं। हा दोस्तों जभ भी आप एक सच्चे महत्वाकांशी रूप से अपने आप को पहचान लेंगे तभी आप सही मायने में सच्चे कमाई के हक़दार होंगे।

मनुष्य चाहे कितना ही क्यों न आमिर हो जाये, अगर वह अपने आप से समाधानी ना हो तो, वह पैसा किसी काम का नहीं। इसीलिए कहने वाले ने भी फुरसत से कहा है, पैसा चाहे कितना भी कमा लो, अगर पैसे से आपका मन संतुष्ट नहीं है, या परिवार संतुष्ट नहीं है तो वही पैसा आपका दुश्मन बन जाता है। इसीलिए सच्ची मेहनत ही मनुष्य को लालच से मुक्त कराती है। तो दोस्तों जानते है एक कहानी के माध्यम से सच्चा परिश्रम करने में जो सुख है, वह सुख कही पर भी नहीं है।

 

मेहनत की पूंजी  – Hard working capital :-

बनारस में एक कर्मकांडी पंडित रहता था। उसका एक आश्रम था और आश्रम के सामने एक जुते सिलाई करने वाला मोची बैठता था। जुता बनाते समय, जुता सिलाई करते समय अर्थात काम करते समय वह भजन या दौहे गाता रहता था। और यह उसकी आदत थी। पंडित थोडा घंमडी मिजाज का था, वह कभी जुता सिलाई करने वाले मोची की तरफ ध्यान नही देता था। मोची ने भी पंडित के तरफ ध्यान नही दिया। मोची अपने ही काम में मस्त रहता।

अचानक पंडित की तबियत खराब हो गई। वह बिमार रहने लगे, उन्होंने बिस्तर पकड लिया। मोची काम करते समय जो भजन गाता था, उसका आवाज पंडित के घर जाता था। जब वे बिस्तर पे पडे थे तो उन्होने मोची के भजन की तरफ ध्यान दिया। उनके कानों में गित सूनाई देने लगे तो उन्होने महसूस किया कि उनका दर्द, तकलिफ कम होने लगा। उनकी दर्द के तरफ से उनकी बुद्धी हट गई और मोची के गीतों मे खो गई।

एक दिन पंडित अपने शिष्यों को भेजकर मोची को अपने आश्रम में बुलवाया। मोची सोचने लगा कि मुझे पंडित ने क्यों बुलाया ? बहूत देर सोचता रहा कि पंडित, एक ब्राम्हण मोची को क्यों बुलायेगा ? वह डरने लगा, बहुत हिम्मत करके वह पंडित के आश्रम में गया। पंडित के शिष्यों ने उसका स्वागत किया ये देखकर मोची को थोडी राहत मिली। शिष्यों ने मोची को पंडित के पास ले गए।

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Hard working capital :-

पंडित ने पहले तो मोची का आभार जताया और कहा कि तुम बहुत अच्छा भजन गाते हो और मेरा दर्द तुम्हारे भजन सुनकर ठिक हुआ। बडे-बडे वैद्य और जडि-बुटी वाले भी मेरा इलाज नही कर सके। तुम्हारे गीत, भजन सुनकर मैं ठिक होने लगा हूं। पंडित ने मोची का 100 रू देते हुए कहा कि तूम ऐसे ही भजन गाते रहो। मेरा दर्द ठिक हो जायेगा। मोची ने अपने जिंदगी में कभी सौ रूपया नही देखा था। वह 100 रूपया देखकर खुश हो गया। मोची का मन पैसो में ही था। वह कहा संभालकर रखेगा उसे चिंता हो गई। कामकाज में उसका मन नही लगता था। वह रूपयों को बार-बार निकालकर देखता रहता था।

 

Hard working capital – मेहनत की पूंजी

वह मन ही मन खुश होता। वह भजन और गीत गाना भी भुल गया। काम करने में मन न होने के कारण काम बिगड जाता था। ग्राहक भी उस पर डांट डपट करने लगे, गुस्सा होने लगे। उधर भजन बंद होने से पंडित का ध्यान दर्द की तरफ जाने लगा, पंडित की हालत भी बिगड ने लगी। और मोची का काम भी जैसे ठप्प हो गया। मोची भी उदास रहने लगा।

मोची ने देखा सौ रूपयों कि वजह से उसका ध्यान काम से हट गया। ग्राहक भि कम आने लगे, किया काम बिगडता वो अलग। उसने सोचा और फिर पंडित के आश्रम में गया और पंडित से बोला आप अपना पैसा वापस रख लिजिये। पंडित ने मोची को देख खुश हुआ और कहा तूम गाते क्यों नही ? पैसा वापस क्यों दे रहे है ? किसी ने कुछ कहा ? मोची बोला नही, कोई कुछ नही बोला पर आपके इन रूपयों ने मेरा मन खराब कर दिया। कहा मेरा काम काज में मन नही लगता, भगवान से मुझे दूर कर दिया। ऐसा पैसा किस काम का जो भगवान की महिमा करना भुला दें, भगवान से दुर कर दें। आप अपना पैसा वापस लेलो मैं ऐसे ही भजन गाउंगा मुझे आपके सौ रूपये नही चाहीये।

मोची ने कहा पंडितजी परिश्रम की कमाई में जो सुख है वह पराये धन में नही है। मोची ने पंडित को पैसे वापस कर अपनी दुकान में चला गया। पैसे वापस करने पर काम में भी मन लगने लगा, और ग्राहक भी खुश होने लगे। मोची गाने लगा तो पंडित भि ठिक होने लगा।

 

इस कहानी का अर्थ :-

ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में और सुख साधनों के आकर्षण में किसी भी मार्ग से पैसा कमाने चाहते है। चाहे चोरी, रिश्वत, लुटमार, धोखा देना यह सब करने तैयार हो जाते है। परिवार में भी धोखा देने सोचते नही। आज की दूनिया में अमिर लोंग भी है, पर क्या उसके पास सच्चा सुख है ? नहीं क्योकि उसके पास खाने को होने बावजूद भी वह खा नही सकता, इसको क्या सच्चा सुख कहेंगे ? नहीं जो मन, परिश्रम से कमाए पैसो में होता है, वह किसी कमाई में नहीं होता। क्योकि मेहनत का पैसा अच्छे जगह पर ही उपयोग होता है। इसीलिए परिश्रम करके आमिर बनो उसमे अलग ही मजा है।

 

Hard working capital

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हसते रहे – मुस्कुराते रहे।

 

Author By : BK गीता…

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