सृष्टि परिवर्तन के लक्षण – Symptoms of creation change

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सृष्टि परिवर्तन के लक्षण - Symptoms of creation change

 

परिवर्तन होना जरुरी है, लेकिन वही परिवर्तन अगर मनुष्य के विनाश का कारण हो तो उसे परिवर्तन नहीं कहा जा सकता है। मनुष्य के अन्दर छुपे संचार गुणों में ही परिवर्तन का रहश्य छुपा है। हर एक व्यक्ति में द्वेष तथा दूसरो के प्रति इर्षा निर्माण होती है। इसीलिए अगर सृष्टि परिवर्तन होती है तो मनुष्य के हित के लिए होना जरुरी है। अन्यथा परिवर्तन की परिभाषा ब्रह्मांड के विनाश का कारण हो सकती है।

 

सृष्टि परिवर्तन के लक्षण – Symptoms of creation change :-

व्यास द्वारा वर्णित महाभारत में बताया गया है कि पांडवो ने ईष्वर से पुछा हे भगवान सृष्टि परिवर्तन के और आपके इस धरती पर पुनः अवतरण के लक्षण बताने की कृपा करें। भगवान मुस्कुराये और बोले ये सभी घटनायें आपको प्रकृती में मनुष्यों के व्यवहार में दिखेगा इसिलिए आप एक-एक प्रहर चारों दिशाओ में घुमकर आओ। फिर आपने क्या-क्या देखा यह आप मुझे आकर बताइये। भगवान से आज्ञा लेकर पांचो भाई चारों दिशाओ में एक एक प्रहर घुमे जो आष्चर्य कारक घटनायें उन्होने मनुष्यों मे, प्रकृती में देखे वह आष्चर्य चकीत हो गये और उनका वर्णन करने भगवान के पास आए।

युधिष्ठिर ने भगवान से बोला, मैंने एक हाथी को देखा जिसकी दो सुंडे थी। अर्जुन बोला मैने एक पक्षि देखा जिसके पैरों में मंत्र बंधे हुए थे, पंरतु वह मांस नोच-नोचकर खा रहा था। इसके बाद भीम भगवान से बोला मैने देखा एक ऐसी गाय थी जो अपनी बछडी का दुध पी रही थी। नकुल ने भगवान से कहा मैने तीन कुए देखा पहला कुआ पानी से भरा था परंतु उसके पास का कुआ खाली था। इन दोनो कुओं से दुर एक दुसरा कुआं था जो पानी से भरा था। और वो खाली कुओं को पानी दे रहा था। सहदेव मोला मैने एक ऐसे चट्टान को पहाड से फिसलते देखा जो रास्ते के सभी पेडों को तोडते मरोडते गिराते निचे आया और अंत में वही चटटान एक घास के तिनके के सहारे रूक गया।

इन सभी आष्चर्य जनक बातों को देख सभी भाई एक दुसरे का मुंह देख रहे थे। और भगवान से उत्तर की प्रतिक्षा देखने लगे।

आध्यात्मिक में छुपा है परिवर्तन का रहस्य :-

भगवान इन पांचो की बातो का दृढ़ व आध्यात्मिक रहस्य बताते हुये बोले, दो मुंह अर्थात सुंड वाला हाथी यह राज्यसत्ता का प्रतिक है। जब अति धर्मग्लानी के समय पापाचार, भ्रष्टाचार होगा तब अति धर्मग्लानी होगी तब वह राजा अर्थात राजनितिज्ञ अमिर व गरिब दोनो को लुटेगा। अपना पेट भरने के लिये वह सिर्फ अमिर व गरिब दोनो को लुटेगा। दोनो से लगान के रूप में, कर के रूप में पैसे वसुल करेगा। उसका एक ही उद्देष्य रहेगा कि कौन से मार्ग से पैसा कमाये जाये। कैसे मेरे परिवार की इच्छायें पुरी हो। सुख साधन धन संपत्ति वस्तु वैभव इन सब चिजों से परिपुर्ण हो। उसके मन में दोनो के लिए दया वा सेवा भावना नही रहेगी।

मंत्रयुक्त पक्षि का और मांस नोच-नोचकर खाने वाले पक्षी का अर्थ हैं, कलियुग के अंतिम समय में जो तथाकथित व्यक्ति होंगे उनके पास तो सभी प्रकार का ज्ञान होगा लेकिन उनकी धन की लालच, चरणों की पुजा इन सभी विकृतियों से वह भरे हुये होंगे। यह व्यक्ति सभी मंत्रो के ज्ञाता भी होंगे। गीता कंठ कर लेंगे परंतु भ्रष्ट आचरण वाले होंगे।

परिवर्तन का रहस्य

गाय का अपने ही बछडे का दुध पीना अर्थात वह इस बात का प्रतिक है की कलियुग में इंसान दुसरो का कमाया खायेंगे। खुद मेहनत ना करके दुसरो पर निर्भर रहेगा।

तीन तरह के अलग-अलग कुओं का रहस्य- धर्मग्लानी के समय मनुष्य अपने मात-पिता या नजदिकी सबंधियों से छल, कपट से इर्ष्या द्ववेष के कारण दुर हो जायेंगे। उनके बुद्धी में यह भावना होगी कि जो परायें लोग कर सकते है वह अपने सबंधि नही कर सकते। इसिलिए वह अपने लोंगो से दुर पराये लोंगो से मदद लेंगे। और उन्हे ही अपना करिबी समझेंगे।

पहाड से गिरता पत्थर धर्म की गिरावट की निशानी हैं। मनुष्य आज धर्म भ्रष्ट कर्म भ्रष्ट बन गये। धर्मग्लानी के समय मनुष्य अपने घर में शुभकार्य में दान-धर्म करते थे, ब्राम्हण खिलाते थे। कथा,पुजा करते थे वो भावना आज नही रही। ऐसे अभी अति धर्मग्लानी का समय है। इन गिरावट से बडे-बडे विद्वानों का पतन हो गया। ऐसे सृष्टि के अंतिम समय में सुक्ष्म ते सुक्ष्म तृण के समान हल्के , बिंदुरूप भगवान शिव के द्वारा मानव मात्र को ज्ञान योग की शरण दी जायेगी तब गिरावट बंद होगी।

इस तरह भगवान ने सरल और आसान शब्दों में सृष्टि परिवर्तन के बारे में बताया।

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Author By :- BK Geeta

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