Earn money from bitter gourd farming – करेले की खेती से पैसे कैसे कमाये

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करेले की खेती से पैसे कैसे कमाए - How to earn money from bitter gourd farming

नमस्कार Apnasandesh.com पर मै भाग्यश्री आपका स्वागत करती हु. दोस्तों, हमारा पिछला लेख शायद आपको पसंद आया होगा, उस लेख में ”Modern methods of irrigation” के बारे में बताया है. जैसा कि मै कृषि विषय (Agriculture) के बारे में लिखना पसंद करती हु और मैं आज उसी संबंधी लेख को प्रकाशित करने जा रही हु, आशा है कि आपको यह लेख भी पसंद आएगा. तो चलिए दोस्तों जानते है कि ‘करेले कि खेती कैसे करे’ इसके बारे में जानकारी हिंदी में.

 

Earn money from bitter gourd farming – करेले की खेती से पैसे कैसे कमाये –

करेले की खेती करने का नया तरीका –

जैसा कि आप जानते हैं भारत में कई वर्षों से करेले की खेती की जा रही है. करेला एक बहुत ही महत्वपूर्ण खाद्य सब्जी है. करेले की सब्जी लोग शुगर की बीमारी (Sugar disease) को ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. यहां तक ​​कि कच्ची करेला या उसके रस का भी उपयोग किया जाता है. इसके फल बहुत कड़वे होते हैं. यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में उगाया जाता है. इसकी खेती किसी भी मौसम में की जा सकती है.

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करेले की खेती – करेला की खेती का परिचय :

1. Bitter gourd का एक अन्य नाम “Bitter Melon” है और इसे हिंदी में “करेला” के रूप में भी जाना जाता है. करेले का वानस्पतिक नाम मेमोर्डिका चार्नटिया (Memordica Charntia) है  माना जाता है कि करेला उष्णकटिबंधीय एशिया (Tropical asia) में उत्पन्न होता है, विशेष रूप से इंडो बर्मा क्षेत्र में.

2. करेला भारत में, तथा इसके आलावा इंडोनेशिया (Indonesia), मलेशिया (Malaysia), चीन (China) और उष्णकटिबंधीय अफ्रीका (Tropical Africa) में व्यापक रूप से उगाया जाता है. यह लोकप्रिय रूप से अपने औषधीय, पोषण और अन्य उत्कृष्ट स्वास्थ्य लाभों के लिए जाना जाता है.

3. बाजार में इसकी उच्च मांग के कारण, करेले की खेती बहुत सफल होती है. करेला मुख्य रूप से रस बनाने और पाक उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता है. करेला का उपयोग हरे या पीले पकने की अवस्था में इसे पकाने के लिए किया जाता है.

4. इसके स्वास्थ्य लाभ हैं जैसे कि यह रक्त विकारों (Blood disorders) को रोकने में मदद करता है, रक्त और यकृत को detoxify करता है, अन्य मदद भी करता है.

5. इस सब्जी का उपयोग हर्बल उत्पादों में भी किया जाता है. मोमोर्डिसिन (Momordicin) की उपस्थिति के कारण इस सब्जी का स्वाद कड़वा होता है.

 

जलवायू और भूमी – ATMOSPHERE AND LAND

करेले कि खेती करणे के लिये सबसे जरुरी है जलवायू, करेले कि खेती के लिये शीतोष्ण (Temperate) एवं सम शीतोष्ण (Even tempered) जलवायू उपयुक्त होती है. करेले कि खेती के लिये कम आद्र तथा गर्मी जैसे मौसम कि जरुरत होती है. इसके लिये 18 से 35 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है. इसे गरम तथा शीत, दोनो हि मौसम मे उगाया जाता है. इसके लिये दोमट भूमी (Loam ground) उपयुक्त होती है जिसका P.H. मान 7. 0 होता है. उस भूमी मे भी अच्छी खेती कि जा सकती है.

 

किस्मे – TYPES

इसमे बहुत सी प्रजातियां पायी जाती है. जैसे कि अर्का हरित, C.O.1, कोयंबतूर लॉंग, कोंकणतारा MDU 1, पुसा दो मौसमी, पुसा विशेष, कल्याणपूर सोना, कल्याणपूर बाह्मासी, पंजाब 14, सी. 96, IHR 4 एवं IHR. 7, NDB..1 आदि प्रजातियां है.

कोयंबतूर लॉंग – यह दक्षिण भारत कि किस्म है. इस किस्म के पौधे अधिक फैलाव मे होते है. इसमे फळ अधिक संख्या मे लगते है तथा फल का औसत वजन 70 ग्राम होता है. इस्की उपज 40 कुंतल प्रती एकड होती है.

कल्याणपूर बाह्मासी – इस किस्म का विकास चंद्रशेखर आझाद कृषी विश्वविद्यालय मे किया गया. इस किस्म के फल आकार से एवं रंग से गहरे हरे होते है यह किस्म दोनो ऋतूओ मे उगायी जाती है. इसकी उपज 60 से 65 सौ पौंड (Quintal) प्रती एकड होती है.

अर्का हरित – इसके फलो मे बीज काफी कम प्रमाण मे होते है. यह किस्म गर्मी तथा बरसात दोनो ऋतूओ मे उगायी जाती है.

पुसा विशेष – यह किस्म बुवाई के 55 से 60 दिन के बाद फल देना प्ररंब करती है इस किस्म के फल मध्यम, मोटे, लंबे तथा गहरे हरे रंग के होते है. फळ का औसाठ भार 40 ग्राम तक होता है.

 

खेत कि तैयारी – PREPARATION OF FARM

खेत कि तैयारी मे पहली बार जुताई में मिट्टी को हल से तथा तीन चार जुताई कल्टीवेटर (Cultivator) या देशी हल से खेत को भुर-भुरा बना लेना चाहिये, आखरी जुलाई मे 250 से 300 सौ पौंड (Quintal) सडी गोबर कि खाद मिलाकर नलीया बनानी चाहिये.

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बीज बुवाई – SEEDLING

सामन्यत: 2.5 से 3 किलोग्रॅम बीज प्रती हेक्टर नाली बनाकर बुवाई करणे पर लागता है. बीज शोधन 2 ग्राम कैप्टान प्रती लिटर पाणी मे मिलाकर बीज को 3 से 4 घंटे भिगोकर छाया मे सुखा कर बीज कि बुवाई करणी चाहिये. इसकी बुवाई दो मौसम मे कि जाती है. जायद मे बुवाई जनवरी से फरवरी तक कि जाती है. खरीप मे बुवाई जून से जुलाई तक कि जाती है. बीज बुवाई हेतू खेत कि तैयारी के बाद 45 से 50 सेंटी मीटर चौडी 1.5 से 2 मीटर कि दुरी पर 25 से 30 सेंटी मीटर गहरी नालीया पूर्व से पश्चिम कि दिशा मे तैयार करके 40 से 50 सेंटी मीटर कि दुरी पर 3 से 4 बीज एक जगह पर बोते है. पौधे से पौधे कि दुरी 45 से 50 सेंटी मीटर रखते है.

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बीज बुवाई के अन्य टिप्स –

1. शुष्क मौसम के दौरान 20 सेंटीमीटर ऊँचा और गीले मौसम के दौरान कम्पोस्ट (Compost) और NPK उर्वरकों (Fertilizers) के मिश्रण से हल या मैकेनिकल बेड शेपर का उपयोग करके बेड तैयार करें.

2. आसन्न फ़रो के केंद्रों के बीच की दूरी 90 सेमी के बेड के साथ लगभग 150 सेमी होनी चाहिए.

3. 2 सेमी की गहराई पर प्रति छेद 2-3 बीज बोएं.

4. अंतरिक्ष छेद 40-60 सेमी के अलावा पंक्तियों में अंतरिक्ष 1.2- 1.5 मीटर अलग छेद प्रति एक अंकुरित होने पर जब पौधों में चार सच्चे पत्ते होते हैं.

5. छोटे प्लास्टिक के बर्तनों में एक ऐसे माध्यम से बीज बोएँ जो अच्छी तरह से नालियाँ, (जैसे कि पीट काई),

6. कमर्शियल पॉटिंग मिट्टी, या मिट्टी से तैयार किया गया एक पॉटिंग मिक्सचर, करेला खाद, चावल की पतवार, वर्मीक्यूलाइट, पीट मॉस और रेत. जब वे 4 से 6 सच्ची पत्तियाँ रखते हैं तो 2-3 बीज प्रति बर्तन और पतले एक ही अंकुर पर बोयें,

7. मृदा जनित बीमारियों और बाढ़ की चपेट में आने से संक्रमण को रोकने के लिए जमीन को छूने से बचें.

8. कीटों को बाहर करने के लिए, नर्सरी को घेरने के लिए 50-60 जाल का प्रयोग करें.

9. रोगमुक्त और मजबूत रोपाई को उठी हुई क्यारियों में रोपाई करें जब वे 10-15 सेंटीमीटर लंबी हो जाएं.

10. स्टेकिंग और ट्रेलाइजिंग से फलों की पैदावार और आकार में वृद्धि होगी, फलों की सड़ांध कम होगी और छिड़काव और कटाई आसान हो जाएगी.

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11. दो सप्ताह के अंतराल पर विकास और कटाई की अवधि के दौरान NPK उर्वरक लागू करें.

12. करेला सूखा सहन नहींकरता इसलिए फ़रो, ट्रिकल या ड्रिप सिंचाई का उपयोग करके अच्छी मिट्टी की नमी बनाए रखें.

 

पोषण प्रबंधन – NUTRITION MANAGEMENT

250 से 300 सौ पौंड (Quintal) सडी गोबर कि खाद आखरी जुताई मे मिलाकर पट लागा देणा चाहिये. इसके साथ 40 से 50 किलोग्रॅम नत्रजन, 40 से 60 किलोग्रॅम फास्फोरस तथा 20 से 40 किलोग्रॅम पोटाश तत्व के रूप मे देणा चाहिये. नत्रजन कि आधी मात्र फोस्फोरस तथा पोटाश कि पुरी मात्रा खेत तैयारी के साम्य तथा नत्रजन कि शेष आधी मात्र दो बार मे टाप ड्रेसिंग के रूप मे देणा चाहिये पहलीबार 4 से 5 पत्तीया पौधे मे आणे के बाद तथा दुसरी बार फुल आणे पर नत्रजन देणा चाहिये.

 

जल प्रबंधन – WATER MANAGEMENT

जायद मे करेले कि खेती मे प्रत्येक सप्ताह सिचाई कि आवश्यकता पडती है. लेकीन खरीप तथा बरसात के मौसम मे बहुत हि काम सिचाई कि आवश्यकता पडती है. पानी न बरसणे पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहणा चाहिये.

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बिटर ग्राउड फार्मिंग में पानी की आपूर्ति – सिंचाई

1. ड्रिप सिंचाई, माइक्रो जेट, स्प्रिंकलर सिंचाई और बेसिन सिंचाई जैसी नवीनतम तकनीक में कई सिंचाई प्रणालियां उपलब्ध हैं लेकिन ड्रैगन फ्रूट प्लांट को अन्य फलों की खेती की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है.

2. पौधे की बेल वृद्धि के प्रारंभिक चरणों के दौरान 3 से 4 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जानी चाहिए.

3. फूलों और फलने की अवस्था के समय वैकल्पिक दिनों की सिंचाई करना महत्वपूर्ण है.

4. जरूरत के आधार पर बेलों की सिंचाई करें, इसके लिए सिंचाई के किसी भी मौसम में या मिट्टी में पर्याप्त नमी होने की आवश्यकता नहीं होती है.

5. बाढ़ या भारी पानी के ठहराव के मामले में, पानी को बाहर निकालना सुनिश्चित करें.

6. पानी की समस्या वाले क्षेत्रों में, पानी का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए ड्रिप सिंचाई सबसे अच्छा विकल्प होगा.

 

करेला खेती में रोग –

1. माइट्स, यह स्प्रे डाइकोफोल 2.5 मील प्रति लीटर पानी के लिए उपयोग से बचा जाता है.

2. बेहतर आसंजन और कवरेज के लिए टीपॉल, ट्रायोन X100, एस्पा आदि जैसे पर्याप्त मात्रा में स्टिकर के साथ एफिड, स्प्रे लमिडाच लोप्रीड 0.5 मिली – लीटर का छिड़काव करें.

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3. बीटल, फलों की मक्खियों को मैलाथियोन 50 ईसी 1 मिली – लीटर के छिड़काव से नियंत्रित किया जाता है.

4. बार-बार फफूंदी दिनोकेप 1 मिली – लीटर पानी के छिड़काव से नियंत्रित होती है.

5. 10 से 12 दिनों के अंतराल पर दो बार स्प्रे मेन्कोजेब या क्लोरोथालोनिल 2 ग्राम – लीटर पानी के हिसाब से हल्का फफूंदी नियंत्रण करें.

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रोग प्रबंधन –

इसमे विषाणू रोग जैसे कि मोजेक कि बिमारी लगती है. इसमे पत्तीया सिकुडणे लगती है. तथा पौशे कि वृद्धी रुक जाती है. इसके नियंत्रण के लिये ग्रसित पौधो को उखाडकर अलग कार देणा चाहिये इसके साथ हि फसल पर डॉ ग्राम मोनोक्रोटोफास प्रती लिटर पाणी मे घोलकर छिडकाव करणा चाहिये. छिडकाव हर 15 दिन के अंतराल पर फासल पर करते रहना चाहीए, जीससे कि रोग न लग सके.

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किट प्रबंधन –

इसमे पत्ती ,तना तथा फली बेधक कीट लगते है. इससे फलो कि गुणवत्ता खराब हो जाती है. कीट नियंत्रण के लिये मैलाथियान 50 ईसी. 1.25 लिटर या कार्बोसल्फान 1.25 लिटर 600 से 800 लिटर पाणी मे मिलकर प्रती हेक्टर के हिसाब से दो तीन छिदकाव करणा आवश्यक है.

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फसल कटाई और पैदावार –

फसल मे जब खाणे लायक फल आ जाये तो प्रत्येक सप्ताह तुडाइ करणी चाहिये. जीससे कि खाणे कि फलो कि गुणवत्ता खराब न हो और बाजार मे भाव अच्छा मिल सके. इसमे खाणे योग्य फल 60 से 70 दिन बुवाई के बाद से मिलणे लगते है. फसल मे सभी तकनिकी प्रयोग करणे पर सामान्य रूप से 100 से 150 Quintal प्रती हेक्टर उपज प्राप्त होती है.

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Author By : भाग्यश्री…

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