Calendar ka Prarambh kab aur kaise Huaa – कैलेण्डर का प्रारंभ

कैलेण्डर का प्रारंभ कैसे हुआ. Calendar ka Prarambh kaise Huaa, कैलेंडर का आध्यात्मिक रहस्य जाने. Calendar ka Janm kab Huaa, पंचांग का आध्यात्मिक रहस्य, पंचांग से संदेश कैसे भेजे, (Calendar ka Parichay in Hindi)

Calendar ka Prarambh kab aur kaise Huaa - कैलेण्डर का प्रारंभ

 

कैलेण्डर के बारे में जानकारी – Calendar ke Prarambh ke bare me jankari :-

नमस्कार आज फिर एक बार ApnaSandesh वेबपोर्टल आप सभी का स्वागत है. दोस्तों आज आपके लिए इस लेख में कैलेंडर के बारे में बताने जा रहे है. क्या आप पंचांग के इतिहास के बारे में जानते है, क्या आप पंचांग का रहस्य जानते है? कैलेंडर के बारे में अधिक जानकारी, इसका उपयोग क्या है, कब से यह हमारे भारत देश में प्रचलित में आया है, क्या आप जानते है? जब मनुष्य ने दिन और रात, इसके पीछे का रहस्य देखा तब उन्हें आभास हुआ. इसके पीछे का कारन क्या है? इन सारी बातोँ की जानकारी आज के लेख के माध्यम से हम ज्ञात करते है.

दोस्तों, सबसे पहले तो हम यह ज्ञात करते है की कैलेंडर को कब और कैसे अस्तित्व में लाया गया और इसका महत्व क्या है तथा पंचांग का प्रारंभ कब किया गया. इसके बारे में मनुष्य को कैसे पता चला? इसके बारे में जानकारी जाने.

Calendar ka Prarambh

कैलेण्डर का प्रारंभ (इतिहास) कैसे हुआ?

दुनिया में सितारों, ग्रहों, नक्षत्रों आदि को समझने का पहला सफल प्रयास भारत में ही किया गया था, सितारों, ग्रहों, नक्षत्रों, चंद्रमा, सूर्य… आदि के महत्वो को समझने के बाद,भारत के महान खगोलविदोंने भारतीय कैलेंडर (विक्रम संवत) तैयार किया गया था, इसके महत्व को उस समय पूरी दुनिया ने समझा था,

लेकिन यह इतना व्यापक था कि – आम आदमी इसे आसानी से समझ नहीं सकता था, विशेष रूप से पश्चिमी दुनिया को बिल्कुल भी नहीं. किसी विशेष दिन, त्यौहार आदि के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए विद्वान (पंडित) के पास जाना पड़ता था, कुछ समय पछात भारतीय कैलेंडर को सीधा और आसान बनाने का प्रयास किया गया था. एक वर्ष में 365/366 में सूर्य के घूर्णन के आधार के रूप में पृथ्वी द्वारा कैलेंडर तैयार किया गया था और चंद्रमा द्वारा इस अवधि के दौरान, पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर और उन्हें सीरियल नंबर के नाम पर रखा गया था,

दोस्तों, यह अविष्कार एक सम्पूर्ण मानव संस्कृति को एक वरदान के रूप में मिला है. कहा जाता है मानवी जिव के प्रारंभ में जब पहली बार मनुष्य ने सूर्योदय और सूर्यास्त को देखा तब उसे दिन और रात का एहसास हुआ. तब मनुष्य ने चाँद की पोजीशन के माध्यम से उन्हें महीने की कल्पना की होगी, और उसके बाद उन्होंने मौसम में होने वाला बदलाव देखकर उनमे साल की कल्पना आई होगी.

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विज्ञानी दिमाग का मनुष्य (कैलेंडर का इतिहास):

आखिर में तो विज्ञानं के विकास के कारण मनुष्य को नया ज्ञान प्राप्त हुआ, फिर उसके बाद मनुष्य ने तय किया की जो पृथ्वी को सूर्य के आसपास एक पूरा चक्कर करने के लिए लगने वाले समय को साल यह नाम दिया होगा.

और उसके बाद जो समय चाँद को पृथ्वी के आसपास एक पूरा चक्कर लगा ने के लिए जो समय लगता है उसे महिना यह नाम दिया गया होगा, फिर क्या जब पृथ्वी खुद के आसपास चक्कर लगानेमें जो समय लगा उसे दिन कहा गया. कुछ इस तरह हमारे पचांग और उससे जुडी रहस्यों को पूर्वजो ने हमारे लिए प्रारंभ की,

Calendar ka Prarambh

कैलेंडर की रचना कैसे हुई:

दोस्तों, आपके जानकारी के लिए बता दे की सबसे पहले मिस्र में उद्घाटन कैलेंडर साल में 12 महीने और महीने में तीस दिन होते थे. शेष दिन वर्ष के अंत में, वर्ष में 365 दिन बिताए गए थे, ग्रीस के लोग चाँद कैलेंडर का इस्तेमाल करते थे. लेकिन यह कैलेंडर पैटर्न हर आठ साल में तीन महीने अधिक कर रहा था. ईसा से 400 साल पहले, खगोलशास्त्री मॉटन ने महसूस किया कि 235 चंद्र महीने 19 साल में फिट होते हैं. उसके बाद रोमन सम्राट इसने ख्रिस्तपूर्व 46 वे साल में कैलेंडर के विकास की दिशा में पहला मुख्य कदम लिया. उसने इस काम में सासिजेबस नाम के astrologist की मदद ली.

इस कैलेंडर में पृथ्वी को सूरज के आसपास एक चक्कर लगाने जो समय लगता था उस पर निर्भर था, इसका नाम सूरज कैलेंडर रखा गया. उसके बाद पृथ्वी को सूरज के आसपास चक्कर लगाने में 365 दिन लगते थे. इसलिए उसे 1 साल की मान्यता दी गयी, और 365 दिन को 12 महीनो में विभाजित कर दिया गया.

फिर उसके बाद जानेवारी, फेब्रुवारी, मार्च, अप्रैल, मई, जून, जलाई, अगस्त, सप्टेम्बर, अक्तूबर, नवम्बर, और दिसम्बर, ऐसे महीनो के नाम रखे गए. फिर यही कैलेंडर उपयोग में लाया गया उसे चाँद कैलेंडर कहते है. यह चाँद के घुमने पर निर्भर था, इसके बाद 22 मार्च 1957 में भारत सरकारने चाँद के प्रदक्षिणा पर निर्भर होने वाला कैलेंडर प्रस्तुत किया गया.

 

किसी समय विक्रम संवत से प्रेरित कैलेंडर था:

यह युग 57 ईसा पूर्व शुरू होता था, इसका अभ्यास उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा शुरू किया गया था. राजा विक्रमादित्य के पिता ने इस कैलेंडर को देखकर, दुनिया भर में कैलेंडर बनाए गए थे, बारह महीने का एक वर्ष और सात दिनों का एक सप्ताह रखने की प्रथा विक्रम संवत से ही शुरू हुई थी. महीने का लेखा-जोखा सूर्य और चंद्रमा की गति से रखा जाता है. ये बारह राशियाँ बारह सौर मास हैं.

इस कैलेंडर को रोमन, अरब और यूनानियों ने अपनाया था. बाद में, लोगों ने इसे अपने स्थानीय समय और विश्वास के अनुसार बदल दिया,

दुनिया के अधिकांश देशों में, सात दिनों में चक्र को विभाजित करने का अभ्यास भारत से ही प्रेरित है. भारत में, सप्ताह के सात दिन ग्रहों के नाम और उनके प्रभाव के नाम पर रखे गए थे. ये हैं – रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार, सूर्य को आदित्य भी कहा जाता है, इसे रविवार को आदित्यवार भी कहा जाता था.

यह दो कैलेंडर के व्यतिरिक्त कुछ देश दुसरे कैलेंडर प्रचलित करके उसका धार्मिक कार्यो के लिए उपयोग करते है. इस तरह ये साल के बार महीनो का इतिहास हमें ज्ञात हुआ.

 

कैलेंडर के बारे में अनमोल बाते:

दोस्तों, अप मुझे बताओ की अगर कैलेंडर न होता तो क्या होता? क्या हम जान पाते महीनो के नाम? नहीं न, क्योंकि हमें इस बारे में कूछ भी पता न होता और तो हम इन सब बातो से अंजान रहते, की दिन क्या होता है? उसमे कितने घंटे रहते है? एक महिना याने क्या होता है? उसमे कितने दिन रहते है? हमें कूछ भी समझ नहीं पाता? सुक्रिया जी हमारे पूर्वजो ने हमारे लिए ऐसे अन्य आवश्यक आविष्कार तथा नियमों को बनाया,

 

Author by: Aparna

 

Inspection supervision:

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Time event: समय घटना 3761 ईसा पूर्व 2 637 ईसा पूर्व में यहूदी कैलेंडर की शुरुआत मूल चीनी कैलेंडर 56 ईसा पूर्व में शुरू हुआ था, विक्रम संवत 45 ईसा पूर्व शुरू हुआ जूलियन कैलेंडर रोमन साम्राज्य द्वारा अपनाया गया था, सनातन धर्म (हिंदू) ने सबसे पहले सप्तऋषि संवत 597 जूलियन कैलेंडर ब्रिटेन में अपनाया था,

 

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