Natak me Career Kaise Banaye – नाटक में करियर कैसे बनाये

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Natak me Career Kaise Banaye - नाटक में करियर कैसे बनाये

 

Natak me Career Kaise Banaye – नाटक में करियर कैसे बनाये:

How to make a career in drama: नमस्कार, आज फिर एक बार ApnaSandesh वेबपोर्टल पर आप सभी का हार्दिक स्वागत है. दोस्तों हर बार हम आपको नई जानकारी से अवगत कराते है. तो दोस्तों आज आपके लिए इस लेख में नाटक में करियर कैसे बनाए? इसके बारे में बताने जा रहे है. क्या आप नाटक के बारे में जानते है, क्या आप नाटक में अपना भविष्य बना सकते है? नाटक के बारे में अधिक जानकारी, इसका उपयोग क्या है, नाटक में कलाकार कैसे बने (How to become a drama Actor), इन सारी बातोँ की जानकारी आज के लेख के माध्यम से हम ज्ञात कराते है.

दोस्तों, मेरा नाम रीतिक है और मुझे शिक्षा और करियर से संबंधित सभी लेख लिखना पसंद है. आशा है कि यह लेख आपको पसंद आएगा, और हमें कमेंट करके जरूर बताएं कि यह लेख आपको कैसा लगा,

नाटक के प्रकार और उसके उपयोग के बारे में जानने से पहले आपको नाटक के महत्व और परिचय से वाक़िफ़ होना ज़रुरी है. इसलिए सबसे पहले हम नाटक का परिचय कराते है.

 

नाटक (परिचय) के बारे में जानकारी:

“नाट्यभिन्नरुचेर्जनस्य बहुध्यापेकं समाराधनम’’

यह वाक्य महान कवी कालिदास जी के है. जिसका मतलब अलग-अलग इच्छा रहने वाले लोगो का एक ही समय में समाधान करनेवाला, नाटक यह एक श्रेष्ट साहित्य प्रकार है. दोस्तों जैसे की आप जानते है की पहले नाटक को बहुत महत्व दिया जाता था. ललित साहित्यों के प्रकारो मे नाटक यह सबसे लोकप्रिय साहित्य प्रकार है.

हम जो देखते है, जो सुनते है वह दूसरों को बताना यह इन्सान की सहज प्रवृति है. हर एक व्यक्ति को खुद को आया हुआ अनुभव, खुसी, दू:ख यह सब बताया जाये ऐसा लगता है, और इसी से साहित्य निर्मिती होती है. लोकसंवाद और लोकरंजन यह नाटक के मुख्य पहलू है. नाटक यह समाज के यथायोग्य दर्शन करने वाला प्रयोगक्षम साहित्य प्रकार है. तो आइये सबसे पहले इसके बारे में जानते है.

 

नाट्य क्या है?

नाट्य यह नाटक की जान है. कभी-कभी अगर कोई बदल अचानक हो जाता है उस वक्त नाट्य निर्माण होता है.

लेखक ने लिखे हुए नाटक को कलाकारों को पेश करना होता है. चित्र या कलाकृति होते ही दिखने लगती है ; लेकिन नाटक को हर बार करके दिखाना पड़ता है. नाटक की सफलता यह लिखने वाले, कलाकार, देखने वाले इन सब पर निर्भर करती है. नाटक को रंगमंच पर प्रस्तुति की जाती है. लेखक ने लिखे हुए संवाद यह हीरो और हीरोइन के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचायें जाते है.

भारत में प्राचीन काल से ही नाट्य कला अस्तित्व में थी. भारतमुनि को भारतीय नाट्य कला का जनक के रूप में जाना जाता है. नाटक इस विषय के बारे संपूर्ण जानकारी देने वाला नाट्य शास्त्र यह ग्रंथ इन्होने ही लिखा था. नाटक यह लेखक, दिगदर्शक, इन की मदद से रंगभूमि पर प्रदर्शित किया जाने वाला उसी तरीके से नाट्य गृह में प्रदर्शित किया जाने वाला कला प्रकार है. नाटक यह अपने जीवन का ही एक दृश्य है और वो कलाकारों की मदद से प्रदर्शित किया जाता है. आँखो से देखना और कानों से सुनना इस वजह से यह दुःख श्राव्य कला है. नाटक यह एक सांघिक कार्य है.

 

नाट्य संहिता के स्वरुप:

संहिता नाटक का सबसे महत्वपूर्ण सिस्सा है. शब्द और कथानक जितने सशक्त, उतने ही ऊचाई तक नाटक. कथानक को विशिष्ठ पूर्ण बनाकर नाटक कलाकार उसे और मजेदार बनता है. समाज के विविध स्तर के लोगो को पसंद आने वाले विषय नाटकार रखता है. नाटक में सबसे महत्वपूर्ण घटक संवाद होता है. खटाकेबाज, मजेसर, चुरचुरीत ऐसे संवाद नाटक की शोभा बढ़ाते है.

 

नाटक बाकी साहित्य से अलग क्यों है:

तो दोस्तों आइये जानते है की नाटक यह बाकी साहित्यों से अलग क्यों होती है, मनुष्य ने मनोरंजन और आत्म समाधानी होने के लिए यह ललित कला का विश्व निर्माण किया. जिस समाज में नाटक की सुरुवात हुई उस समाज में रहनेवाले लोगो की भाव-भावना नाटक के माध्यम से प्रकट हुई. नाटक यह साहित्य प्रकार को अगर विषय की दृष्टी से देखा जाये तो यह हर क्षेत्र में समृद्ध होते गया.

ज्ञान और मनोरंजन के साथ दर्शक खुद के अनुभवों को नाटक में घड़ने वाले प्रसंगो के साथ जोड़ते है, इस लिए उस नाटक में अपनापन आ जाता है. खानी, कादम्बरी, नायक इन सभी में समाज की समकालीन दृश्य दिखाने की क्षमता होती है, लेकिन कहानी, कादम्बरी, कविता इन सभी से नाटक यह अलग साहित्य प्रकार है. बाकि के साहित्य प्रकार यह सिर्फ वाचक निष्ठ है और नाटक एक समूह का आविष्कार है. संगीत, चित्र, अभिनय, काव्य ऐसी सभी कलाओ का प्रदर्शन नाटक में एक साथ किया जाता है.

विस्नुदास भावे इन्होने लिखा हुआ सिता स्वयंवर यह आधुनिक मराठी नाटक में पहला नाटक है.

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नाटक के प्रकार:

नाटक के प्रकारों के बारे में देखा जाये तो नाटक किस तरीके से या किस हेतु से प्रदर्शित किये जाते है इस पर निर्भर करता है. .

A. संगीत नाटक
B. प्रायोगिक नाटक
C. व्यवसायिक नाटक

 

A. संगीत नाटक:

संगीत नाटक में सबसे महत्वपूर्ण संगीत होता है. अन्ना साहेब किर्लोरकर इन्होने संगीत शांतिकुल और संगीत सुभद्रा इन नाटको के जरिये संगीत नाटक को एक कला के स्तर पर पंहुचा दिया है. संगीत नाटको की वजह से ही दुनिया में नाटक एक मनोरंजन का हिस्सा बनी.

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संगीत नाटको की वैशिष्ट:

1. मनोरंजन के माध्यम से समाज के प्रश्नों पर सवाल खड़े किये जाते है.

2. दर्शको को ध्यान में रखते हुए संगो नागित नाटक की रचना की जाती है.

3. संवादों का प्रयोग कम किया जाता है.

4. अभिनय और संगीत दर्शको को भाता है.

5. वैविध्यपूर्ण संगीत,

6. लोक गायकी और ख्याल गायकी का उत्तम संयोग.

 

B. प्रायोगिक नाटक:

प्रायोगिक नाटक का मुख्य हेतु नाटक का विषय और हेतु इन में प्रयोग करना होता है. यह नाटक भी व्यवसायिक तौर पर किये जा सकते है. नाट्य क्षेत्रो में 1960 के बाद प्रायोगिकता आई.

 

प्रायोगिक नाटक की वैशिष्ट:

1. आशय और अभिव्यक्ति स्वतंत्र तौर पर लिए जाते है.

2. जगह, वक्त, अभिनय, तंत्र इन में जनिपुर्वक बदलाव किये जाते है.

3. प्रायोगिक नाटक में कुछ अलग दिखने की कोशिस होती है.

4. भाषिक प्रयोग किये जाते है.

 

C. व्यवसायिक नाटक:

व्यवसायिक नाटक यह केवल व्यवसायिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए उनका नाट्य प्रयोग किया जाता है. दर्शको जो और जैसा पसंद आता है वैसा देने का प्रयास किया जाता है. अलग-अलग विषयों को लेकर व्यवसायिक नाटको की निर्माती हुई है.

 

व्यवसायिक नाटक की वैशिष्ट्य:

1. व्यवसायिक नाटक के माध्यम से सामाजिक समस्यायों को रखा जाता है.

2. व्यवसायिक नाटको का स्वरूप बोधपर और मनोरंजक होता है.

3. नाटक और दर्शक इनके बिच में एक संबंध बन जाते है.

4. पारिवारिक, सामाजिक, पौराणिक ऐसे विषयों पर व्यवसायिक नाटक होते है.

5. दर्शको के इच्छा के अनुसार नाटक की मंडनी की जाती है.

6. व्यवसायिक नाटकों की निर्मिती के पीछे छुपे राज के साथ व्यवसायी हेतु है.

 

Author By: RITIK

 

Inspection supervision:

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